मोदी सरकार अब राफेल विमान मुद्दे को लेकर अजीबोगरीब दावे कर रही है। 2019 चुनाव करीब होने के कारण सरकार ऐसी स्तिथि में आ गई है कि अपने बचाव में अब सरकारी कंपनियों को ख़राब बता रही है और कुछ दिनों पहली बनी कंपनियों को कामयाब।

राफेल सौदे से सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को बाहर किए जाने पर रक्षा मंत्री ने उसकी खराब हालत को वजह बताया है। भारत में राफेल विमानों का उत्पादन खर्च भी बहुत ज्यादा बैठ रहा था।

समाचार एजेंसी से बातचीत में रक्षा मंत्री ने कहा कि एचएएल के पास इतनी क्षमता ही नहीं थी कि वह फ्रांसिसी कंपनी दासो एविएशन के साथ मिलकर भारत में इस अत्याधुनिक जेट विमान का निर्माण कर सके।

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इस बात पर इसलिए विवाद है क्योंकि एचएएल भारत की लौती लड़ाकू विमान बनाने वाली कंपनी है। एचएएल कई बार भारत के लिए अन्य देशों के साथ मिलकर लड़ाकू विमान बना चुकी है। कंपनी को इस क्षेत्र में 50 साल से ज़्यादा का अनुभव है। वहीं, अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेंस इस समझौते से केवल 14 दिन पहले बनी है।

क्या है विवाद

राफेल एक लड़ाकू विमान है। इस विमान को भारत फ्रांस से खरीद रहा है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है। ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस डील में सरकार ने उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाया है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 526 करोड़ थी।

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इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डासौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। 2015 में मोदी सरकार ने इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए 2016 में नई डील की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई डील में एक विमान की कीमत लगभग 1670 करोड़ रुपये होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें। नई डील में अब जहाज़ एचएएल की जगह उद्योगपति अनिल अंबानी की कंपनी बनाएगी। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर भी नहीं होगा जबकि पिछली डील में टेक्नोलॉजी भी ट्रान्सफर की जा रही थी।