देश की अर्थव्यवस्था के हालात बिगड़ते जा रहे हैं। देश में एक तरफ जहाँ स्वदेशी कारोबार का ग्राफ गिर रहा है और लोग बेरोजगारी से परेशान हैं वहीं अब विदेशी निवेश यानि एफडीआई भी घटती जा रही है।

मोदी सरकार का दावा है कि उसके आने के बाद देश को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर एक नई पहचान मिली है। पहले के मुकाबले सभी क्षेत्र के ज़्यादा लोगों ने भारत की तरफ आकर्षित होना शुरू किया है। लेकिन आंकड़े कुछ और कहानी बता रहे हैं।

बिज़नस स्टैण्डर्ड की एक खबर के मुताबिक, खनन क्षेत्र क्षेत्र में एफडीआई लगातार गिरती जा रही है। जहाँ वर्ष 2014-15 में खनन क्षेत्र में 659 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानि कि लगभग 3,737 करोड़ रुपिए का विदेशी निवेश हुआ था वहीं, ये इस वर्ष 2017-18 में गिरकर 36 मिलियन डॉलर यानि कि लगभग 250 करोड़ रुपए रह गया है।

मतलब 3,383 करोड़ रुपए का नुकसान!

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खनन क्षेत्र में इन तीन सालों में ये बड़ी गिरावट आई है। ये तब है जब मोदी सरकार देश में विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए कई श्रम विरोधी कानूनों को बढ़ावा दे रही है।

गौरतलब है कि खनन क्षेत्र का जीडीपी में 7-8% का योगदान देता है और करोड़ों की संख्या में लोग इसमें कार्यरत हैं। ऐसे में अगर निवेश गिरेगा तो नौकरियों पर भी मुसीबत आ सकती है।

दरअसल, नोटबंदी के बाद से देश में जिस तरह के आर्थिक हालत बदले हैं। उसके बाद से ज़्यादातर क्षेत्रों के की स्तिथि ख़राब नज़र आ रही है। जीएसटी ने इन हालातों को और ज़्यादा ख़राब करने का काम किया है। और ऐसे में विदेशी निवेशक भी पैसा निवेश करने से बचते नज़र आ रहे हैं।

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